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5.6.2024

  ख़्वाब के गाँव में पले हैं हम जावेद अख़्तर 301 ख़्वाब के गाँव में पले हैं हम पानी छलनी में ले चले हैं हम छाछ फूंकें कि अपने बचपन में दूध से किस तरह जले हैं हम ख़ुद हैं अपने सफ़र की दुश्वारी अपने पैरों के आबले हैं हम तू तो मत कह हमें बुरा दुनिया तू ने ढाला है और ढले हैं हम क्यूँ हैं कब तक हैं किस की ख़ातिर हैं बड़े संजीदा मसअले हैं हम स्रोत : पुस्तक  : tarkash (पृष्ठ 71)