5.6.2024

 

ख़्वाब के गाँव में पले हैं हम

ख़्वाब के गाँव में पले हैं हम

पानी छलनी में ले चले हैं हम





छाछ फूंकें कि अपने बचपन में

दूध से किस तरह जले हैं हम





ख़ुद हैं अपने सफ़र की दुश्वारी

अपने पैरों के आबले हैं हम





तू तो मत कह हमें बुरा दुनिया

तू ने ढाला है और ढले हैं हम




क्यूँ हैं कब तक हैं किस की ख़ातिर हैं

बड़े संजीदा मसअले हैं हम

स्रोत :
  • पुस्तक : tarkash (पृष्ठ 71)

Comments